बुधवार, 14 सितंबर 2011

अपने पथ से नहीं हटेंगे (14 सितंबर 2011,हिन्दी दिवस)

अपने पथ से नहीं हटेंगे
- Kaushalya


नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे;
डटे रहेंगे डटे रहेंगे, अपने लक्ष्य पर डटे रहेंगे.


साहस के इस कठिन मार्ग पर, आगे बढ़ने से;
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


चल पड़े है करने साकार, देने अपने सपने को आकार;
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


पाने अपनी मंज़िल को, मुश्किलों से नहीं डरेंगे;
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


दुश्मनों की हो लंबी कतार, हम भी करेंगे सामना;
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


जितनी जुगत लगाले, चाहे जितना दम हो उसमे,
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


कर ले ज़ोर आँधी और तूफ़ान, अपने इरादों से अब हम,
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.


भर अपने आत्मा में विश्वाश, पगभर भी अब तो,
नहीं हटेंगे नहीं हटेंगे, अपने पथ से नहीं हटेंगे.
--

सोमवार, 27 जून 2011

नाम से बड़ा कर्म (बोधात्मक कथा)

"नाम से बड़ा कर्म" (बोधात्मक कथा)

-Kaushalya

तीन सहेलियाँ थी। जिनके नाम थे सोना, रूपा, और माला।
तीनों बचपन से साथ खेली और बड़ी हुई।
बड़े होते ही तीनों की शादी कर दी गई।
एक दिन जब तीनों सहेलियाँ मायके आई हुई थी तब एक-दूसरे से मिलने के लिए आतुर थी।
तीनों खुश दिखाई पड़ रही थी। काफ़ी वक्त के बाद जो मिल रही थी।
बातों – बातों में एक-दूसरे के पति के बारें में जानने के लिए उत्सुकता बताई।
इतने में रूपा बोल उठी – “अरी! अपने अपने पतिदेव के नाम तो बताओं, क्या नाम है उनके ?”
उसकी बात सुन सोना ने पहल दिखाई और कहने लगी – “मेरे पति का नाम लखपति है।”
उसका यह जवाब सुनकर रूपा ने भी बड़े चाऊ के साथ कहा – “मेरे पति का नाम तो धनवटी है।”
रूपा के पति का नाम सुनते ही सोना ने माला से प्रश्न किया कि – “अरी! माला तेरे पति का क्या नाम है ?”
माला ने शरमाते हुए हिचकिचाहट के साथ कहा – “मेरे पति का नाम ठठनगोपाल है।”
माला के पति का नाम सुनते ही सोना और रूपा हँसने लगी। उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहने लगी – अरी! ये भी भला कोई नाम है ‘ठठनगोपाल’।
माला तो शरम से पानी हुए जा रही थी। उसकी नज़रें शरम के भार से गरदन के साथ झुक गई।
इतने में सोना ने पूछ लिया कि – “ये तो बताना कि वो करते क्या है?”
भाई! मेरे पति तो जंगल से लकड़ियाँ काटकर लाते है और उसे बेचते है। उसी से हमारा घर चलता है।
गहरी सांस लेते हुए बोली कि - किसी दिन अगर लकड़ियाँ ना बीके तो खाने के लाले पड़ जाते है।
रूपा यह सुनते ही अपने पति के बारे में बताते हुए कहने लगी कि – “मेरे पति तो भीख मांगते है। जिस दिन भीख ना मिले उस दिन भूखे पेट सोना पड़ता है।”
फिर धीरे से रूपा ने माला से पूछा - तुम्हारा पति क्या करता है?
तो माला ने बड़े गर्व के साथ सर उठाकर इतराते हुए कहा कि – “मेरे पति मेहनत- मजदूरी करके कमाते है। इससे हमे दो टंक के खाने की रोटी जरुर मिल जाती है।”
माला मन-ही-मन मुस्कुरा रही थी।
वो सोच रही थी कि –
“लखपति बेचे लकडियाँ,
धनवटी मांगे भीख,
उससे तो मेरा ठठनगोपाल ठीक।”

जो मेहनती है, आलसी नहीं है। भरपेट खाना तो खिलाता है। किसी दिन खाना नहीं मिलेगा का डर तो नहीं।
सोना और रूपा की तरह लटकती हुई तलवार के जैसा तो जीवन नहीं है।
नाम अगर ‘ठठनगोपाल’ हुआ तो क्या है, मैं गर्व के साथ सिर उठाकर जी तो सकती हूँ।
और तीनों सहेलियाँ शाम हो जाने कि वजह से अपने-अपने घर को लौट गई।
*_*
बोध :- नाम कोई भी हो, कैसा भी क्यों न हो, किन्तु नाम के आगे कर्म महान होता है। जो हमे इज्जत से सर उठाकर जीने का जीवन और चैन की नींद देता है।