सोमवार, 21 दिसंबर 2009

गुरुजी को समर्पण

गुरुजी को समर्पण
- Kaushalya
गुरूजी को सत् सत् वन्दन
गुरूजी तुज़को समर्पित
मेरा सारा जीवन
गुरूजी तेरे ही हाथों
मेरे जीवन की बागडोर
अब तारे या दुबोदे ये तेरी मरज़ी
गुरूजी मैं करू न शिकवा
जिस पथ ले जाये जाऊँ रे
गुरूजी में तो हूँ तेरी गाय
जैसे चाहे रखे तू
गुरूजी तेरे ही भरोसे
जीवन नैया डाली मझधार
लगदे किनारे या करदे बेडा पार
गुरूजी एक तेरे ही सहारे
ये जीवन नैया पार हो जाये
गुरूजी तू ही मेरी दुनिया
गुरु जी तेरे ही हवाले
मेरा जीवन समर्पण
*

रविवार, 20 दिसंबर 2009

होंशले बुलंद है दोस्त

होंशले बुलंद है दोस्त
- Kaushalya
होंशले बुलंद है दोस्त
चाहे गीर जाए
चाहे ठोकर खाए
चाहे ज़ख्मी हों
फिर भी,
होंशले बुलंद है ए दोस्त
*
हर तूफ़ान का करेंगे सामना
कफ़न ये बांध लिया है शर पर
क्योंकि,
होंशले बुलंद है ए दोस्त
*
डट गए तो फिर से उठेंगे
सँभालेंगे अपना दामन
क्योंकि,
होंशले बुलंद है ए दोस्त
*
ज़ालिम ज़माने की करेंगे न परवा,
मुँह तोड़ जवाब देंगे उसका
आगे कि ओर कूच कर गए कदम
मुड़ के न देखे दोबारा न नयन हमारे
क्योंकि,
होंशले बुलंद है ए दोस्त
*
जंग-ए-ऐलान का बिगुल बजा दिया
आजाये जो कोई हो दुश्मन
क्योंकि,
होंशले बुलंद है ए दोस्त
*
अन्याय और अत्याचार नहीं सहेंगे
चेहरे पर आएगी मुस्कुराहट वापस
करेंगे अपने सपने पुरे
बहारें आयेगी फिर से
क्योंकि,
होंशले बुलंद है ए दोस्त
*
जल उठी क्रांति की ज्वाला
होगी नवयुग की स्थापना
क्योंकि,
होंशले बुलंद है अपने
नव चेतन से भरा आया
'नवयुग'
*

तूफ़ान-ए-गुस्सा

तूफ़ान-ए-गुस्सा
- Kaushalya
गुस्सा है गुस्सा मेरा,
नहीं है कोई आग,
जिसे पानी से बुझाई जाए
*
नाही ..कोई हवा है
जिसे कैद की जाए,
*
नहीं है रत कोई
जो चाँदनी से शीतल हो जाए,
*
नहीं है नदी का पानी
जो लहरों में बह जाए,
*
नहीं कोई खुश्बू जो,
फ़िज़ाओ में बिखर जाए,
*
और नहीं है कोई गीत
जो गुन-गुना लिया जाए,
*
नहीं कोई दिशा जो
बाँट दिया जाए,
*
ये तो..
तूफ़ान है तूफ़ान
जिसे रोकना मुश्किल ही नहीं
ना मुमकिन भी है,
*
इस आफत पर लिखा गया
तुम्हारा नाम है :X
*
..सावधान..
*
आक्रमण
*

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

प्रेम सुधा

प्रेम सुधा
- Kaushalya
प्रेम क्या है, कुछ भी तो नहीं
सिर्फ एक मीठा एहसास है वो
प्रेम तो अपने आप में पूर्ण है
उसे देखना-समझना मुश्किल है
उसकी पहचान परखने से नहीं होती
प्रेम तो अनुभव करने का नाम है
श्री कृष्ण ने भी अपने जीवन से
प्रेम को जगत का सार कहा है
निर्मल-निश्छल-निस्वार्थ-निरामय
अलंकार है प्रेम रूपी रत्नाकर के
प्रेम से भक्ति के द्वार खुल जाते है
और भक्ति से परमेश्वर की पहचान
परमेश्वर में लीन हो कर जीवात्मा
सुख - दुःख से परे हो जाता है
वह कर्म के बन्धनों से मुक्त हो जाता है
जीवन के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति होती है.
* * *

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

लगता है ऐसा

लगता है ऐसा
- Kaushalya
लगता है ऐसा...
जैसे, ज़मीन रुक सी गयी है...
हम थम से गए है
प्रकृति प्रगति के पथ पर है
ये कैसे हो सकता है !
एक साथ चलनेवाले दोनों
उसमे एक आगे और एक पीछे
कैसे हो सकता है फिर एक
कब हुआ ऐसा ?
जब किस्मत रूठ जाती है
खुशियाँ नजरे चुराती है
ख्वाबों को अग्निदाह लग जाता है
सोच मूक हो जाती है
चित्त चिंता चुरा जाती है
तारामंडल से एक सितारा बिखर जाता है
हर वफ़ा जब बेवफ़ा कहलाती है
मध्याहन में सूरज प्रखरता से जलता है
मोमबत्ती पिघलकर प्रवाही में बह जाती है
पतंगा परवाना बन,
दिये की लौ पर फ़ना हो जाता है
समन्दर की लहरों में जब सुनामी उठती है
फूल शाख से मुरझाकर गिर जाते है
पतझड़ के झोकों में पत्ते बिखर जाते है
लगता है ऐसा मानो..
कुदरत ने अपना विषाद,
आक्रोश के रूप में
खंडिता नायिका का चोला पहन लिया।
*

करुणा

करुणा
- Kaushalya
इन सब की करुणा तो देखिये...
सूरज खुद तप कर,
अंधकार दूर कर के,
संसार को उजाला देता है

चाँद के पास जो शीतल रोशनी है,
वो खुद के पास न रखकर,
सारी सृष्टि को शीतलता प्रदान करता है

नदियों के पास अखूट जल स्रोत है,
वो अपने लिए न संचित कर,
जगत के कल्याण में बाँट देती है

फूलों से उसकी खुश्बू जुडी हुई है,
कभी भेद-भाव नहीं करते सौरभ बिखेरने में,
अपितु समग्र वातावरण को पुलकित कर देते है

प्रकृति में पेड़ की सहनशीलता तो देखिये,
खुद धूप में तप कर, मौसमी तूफ़ान झेलकर
हमे छाँव ,फल और आरक्षण देते है ।
*